शरीर की भाषा में कर्ण (कान) और नासिका (नाक) का भी अपना अलग-अलग महत्व है। चेहरे के अगल-बगल श्रवणेन्द्रिय का स्थान होता है। कान हमारे शरीर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है। सुनने का सारा दायित्व कानों पर होता है। शरीर के निर्माण में कानों की भूमिका तथा भावी जीवन के संकेत कानों की रचना देखकर मिल सकते हैं।
कानों के मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं-
1 सामान्य कान
2 ऊर्ध्वगत कान
3 निचला कान

सामान्य कान वाले व्यक्ति सच्चरित्र, मितभाषी, कर्मठ, विश्वसनीय, स्वावलंबी तथा धैर्यवान होते हैं। ऐसे व्यक्ति कानों के पक्के होते हैं, वे जो भी निर्णय लेते हैं, काफी सोच-समझकर लेते हैं।
ऊर्ध्वगत कान वाले व्यक्ति शर्मीले, एकांतप्रिय, मृदुभाषी, दुर्बल हृदय, धर्मभीरू तथा स्त्रियों के प्रति आसक्ति रखने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति मुख्यतः बहुत खर्चीले होते हैं तथा मित्रों एवं सभासदों को प्रसन्न रखने के लिए अपव्यय करने में भी संकोच नहीं करते।
निम्नगत कान वाले व्यक्ति प्रायः सतर्क, अपने लाभार्थ सतत उद्योगशील, दूसरे के धन के लोभी, स्वार्थी तथा बहुभोजी होते हैं। इनके आचरण में स्वच्छता नहीं होती। ऐसे कान वाले व्यक्ति को क्षुद्र कान वाला कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति कानों के कच्चे होते हैं और दूसरों की कही बातों पर बिना आगा-पीछा सोचे विश्वास कर लेते हैं।
बाहरी कानों की रचना यदि वर्तुलाकार हो और वे देखने में लंबे, सुडौल और रक्तिम हों तथा निचला भाग स्थूल हो, तो ऐसा व्यक्ति उदार, कला-प्रेमी, भावुक, काव्यशास्त्र तथा संगीत में रुचि रखने वाला एवं अध्ययनशील होता है।
‘आकार की दृष्टि से बड़े कानों वाला व्यक्ति प्रायः भाग्यवान होता है। मध्यम कानों वाला व्यक्ति चतुर व उद्योगशील होता है। छोटे कानों वाला व्यक्ति सतत संघर्षशील होता है।
कानों की भांति नासिका यानी नाक को मुखमंडल पर अपना उच्च स्थान प्राप्त हैं। इसलिए नाक के साथ कई मुहावरे जुड़े हुए हैं। जैसे—नाक ऊंची होना, नाक नीची होना, नाक कटना, नाक चढ़ाना आदि।
शारीरिक भाषा (बॉडी लैंग्वेज) में नाक की संरचना के आधार पर भविष्य कथन तथा मनोभावों का अनुमान लगाया जाता है। नाक की बनावट को लेकर उसे निम्न 7 भागों में बांटा गया है–
० संधि-क्षेत्र
० पासा क्षेत्र
० नासिका समग्र
नासापुट
• नाक का अग्रभाग
० नासिका छिद्र
० अधो संधि-क्षेत्र
उपरोक्त विभाजन के आधार पर विविध प्रकार की नासिकाएं दिखाई पड़ती
हैं। ऊपरी (ऊर्ध्व-संधि) क्षेत्र से एक सीधी रेखा यदि नासापुटों के बीच, नाक- बिंदु तक दिखाई पड़े, तो ऐसी नाक वाले व्यक्ति सरल, विनम्र तथा सहज होते हैं। अपनी लापरवाह प्रकृति के कारण उन्हें कभी-कभी धोखा भी उठाना पड़ जाता है। वे व्यवसाय में चतुर किन्तु व्यवहार में अकुशल होते हैं।
पासा क्षेत्र, ऊपरी संधि-स्थान तथा निचले संधि-स्थल के मध्य ऊपरी हिस्से को कहा जाता है। वस्तुतः पासा वह भाग है, जहां नासिका के बीच और ललाट को स्पर्श करती हुई आगे मध्य भाग तक नाक की हड्डी होती है।
ऊपरी भाग और मध्य भाग स्थूल हो तो यह संकेत देता है कि ऐसा व्यक्ति कर्मठ, आशावादी तथा दृढ़ संकल्प वाला होना चाहिए।
दबे हुए चपटे पासा वाला व्यक्ति प्रायः स्वार्थी तथा अविश्वासी होता है। यदि पासा मध्य में उठा हुआ हो, तो व्यक्ति चंचल, मतिहीन एवं माता-पिता के प्रति अश्रद्धालु होता है। यह क्षुद्र प्रकृति का एवं क्रोध करने वाला होता है।
नासिका समग्र से अभिप्राय ऊपर भौहों के पास से लेकर नीचे नासारंध्र तक माना जाता है। यदि नासिका सुंदर, आकर्षक, ऊंची, सम्यक उतार-चढ़ाव वाली सुडौल होती है, तो ऐसी नासिका वाला व्यक्ति बड़ा स्वाभिमानी, कलाप्रिय, ऐश्वर्यशाली, समृद्ध तथा विवेकशील होता है।
ऊपर अधिक पतली तथा नीचे ज्यादा चौड़ी नाक वाला व्यक्ति दंभी, चिड़चिड़ा,
दुर्गुणी तथा अहंकारी होता है।
नीचे फैलावदार तथा मध्य में चपटी नाक वाला व्यक्ति रोगी, कूपमंडूक, भ्रष्ट तथा दुराग्रही होता है। यह व्यक्ति काफी समय तक दुखों को भोगकर मृत्यु का ग्रास बनता है। 1
नासापुटों को नथुना भी कहा जाता है उत्तम, सुडौल, गोलाकार, सुस्पष्ट नथुना अथवा नासापुटों वाला व्यक्ति सौभाग्यशाली, कर्मठ एवं विवेकशील होता है।
इसके विपरीत फैले हुए बेडौल एवं श्यामल नथुने वाला व्यक्ति आली
तथा असंयमी एवं दरिद्र होता है।
बहुत फैला हुआ, वक्र और मोटा नासापुट अच्छा नहीं माना जाता। यह विलासिता, मतिहीनता तथा अस्थिरता का परिचय देता है।
छोटे, गोल, सपाट नथुने स्वार्थ, दंभ, असहिष्णुता एवं दिखावा प्रकट करते हैं। इसका व्यक्ति जीवन में अत्यंत कृपण एवं मायावी होता है। इस तरह के नासापुट अगर ज्यादा श्याम (सांवले), कठोर तथा खुरदुरे हों तो व्यक्ति स्नायु रोगी, कदाचारी एवं निम्न प्रवृत्ति का होता है।
दोनों नासापुटों मध्य का अगला भाग नासाग्र, नासाबिंदु, नाक का हिस्सा (Nose Point) कहा जाता है। यदि यह स्थान नुकीला, सुडौल तथा हिदों युक्त तो व्यक्ति अत्यंत सुखी जीवन-यापन करता
बहुत नुकीली नाक प्रायः अच्छी नहीं मानी जाती। नासिका का चपटा होने पर व्यक्तित्व धूमिल दिखाई पड़ता है। ऐसे व्यक्ति विद्वान भी होते देह की भाषा में नासा छिद्रों की बनावट का भी विशेष महत्व
नासाछिद्र गोलाकार, अंडाकार एवं आम्र आकार के भी देखने में आते हि यदि नासिका से आवृत्त रहते हैं, मनोहारी लगते हैं, यदि सुअर के के छिद्रों की भांति बाहर दिखलाई पड़ते हैं, बहुत बुरे प्रतीत होते हैं। अविकसित, लघु अथवा अति बड़े छिद्र सदैव ही अच्छे नहीं माने नासापुट एवं नासाछिद्रों की सुहावनी संरचना सौंदर्य सौभाग्यसूचक मानी जाती (नासा) का संधि-क्षेत्र नासाछिद्रों के मध्य की पट्टी है, जो छिद्रों को दो भागों में बांटती है। मांसल, सामान्य नुकीला होने
नासिका संधि-क्षेत्र भी सुडौल होता
यह बहुत मोटा चाहिए। पतला, सम और उन्नत हो तो नासिका के सौंदर्य की वृद्धि सहायक होता अधो-संधि उन्नत तथा प्रकार का गया सौभाग्य सच्चरित्रता द्योतक होता अवनत क्षेत्र लक्षण विपरीत कहे गए
सीधी, सरल, नासिका, जिसका आकार ऊपर से नीचे सुडौल भाग्यवान व्यक्ति का कराती उठावदार नासिका, उभरे पासे, बेडौल नासापुट तथा बड़े छिद्रों युक्त नासिका मुख्यतः अच्छी नहीं मानी जाती। (इसका) व्यक्ति अस्थिर मति भटकने वाले होते स्थूल, सपाट तथा आगे गोलाई लिए नासिका वाला व्यक्ति अपने काम पक्का तथा व्यवसायी प्रकृति का है।
तोता की तरह नासिका वाला व्यक्ति क्रमशः नाटकीय, जल्दबाज, मतलबी, चिंतनहीन और भीरू एवं हिंसक प्रवृत्ति का होता है।
रोमयुक्त नासापुट, गोलाकार नासिका छिद्र, खुश्क तथा खुरदरी नासिका वाला व्यक्ति किन्तु निर्विकारी होता है।
ऊपर नीचे तक सीधी, नाक का अगला भाग चपटा, अंडाकार नासाछिद्र दर्शाते हैं कि व्यक्ति कर्मठ, आवेशी, संघर्षशील तथा साहसी होते हैं। यह व्यक्ति अपनी विद्या, तथा चरित्र से दूसरे लोगों का मन अपनी ओर आकर्षित करने सफल होता है।
जिन व्यक्तियों की नासिका का उभार कम तथा नासापुट लघु (गोल), नाक के छिद्र मोठे तथा आच्छादित होते हैं, वे प्रायः अपने काम से काम रखते हैं तथा न तो वे दूसरों के टंटों बखेड़ों में पड़ते हैं और न स्वयं उपद्रवी होते हैं।
प्रारंभ का उभरा हुआ, मध्य का वर्तुलाकार, स्थूल एवं उठे हुए नासापुटों वाली नासिका से पता चलता है कि व्यक्ति अत्यंत महत्वाकांक्षी, डींगे हांकने वाला होगा। इस प्रकार के व्यक्ति में प्रायः वाणी चातुर्य, आलोचनात्मक प्रकृति तथा सूक्ष्म पर्यवेक्षण का गुण भी पाया जाता है। ऐसे लोग अपनी कमजोरियों को सहजता से छिपा लेते हैं, किन्तु दूसरों के अभ्युदय से ईर्ष्या रखते हैं।
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