‘बॉडी लैंग्वेज’ यानी ‘शरीर की भाषा’ का प्रयोग पशु-पक्षी, जीव-जंतु करते हैं। प्राचीनकाल में आदिमानव भी इसी शारीरिक भाषा का प्रयोग किया करते थे, क्योंकि भाषा या शब्द (शाब्दिक भाषा) से वे नितांत अपरिचित थे। वस्तुतः शारीरिक भाषा के साथ-साथ सांकेतिक भाषा का प्रयोग भी उनके बीच होने लगा था।
किन्तु समय के साथ विकास भी अवश्यंभावी होता है। याँ संसार के समस्त प्राणियों में मानव को सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना गया है, क्योंकि उसमें अन्य प्राणियों की अपेक्षा कहीं अधिक गुण और विशेषताएं हैं।

मानव में पाई जाने वाली इन अनेक विशेषताओं में से दो विशेषताएं और गुण अत्यधिक महत्वपूर्ण और विशिष्ट हैं, जिन्हें हम सहज ही संसार के विकास, प्रगति और उन्नति का आधार मान सकते हैं। मानव के ये दो विशिष्ट गुण हैं उसकी कल्पनाशक्ति तथा जिज्ञासा की भावना! मानव मन में उसकी बुद्धि, विवेक, ज्ञान और उसके आसपास के वातावरण के आधार पर उसकी कल्पना हर समय कोई- न कोई चित्र या विचार प्रस्तुत करती रहती है और जब वह चित्र या विचार मानव मन की गहराइयों तक पैठ जाता है तो उसे साकार रूप में देखने या उसे क्रियात्मक रूप देने की एक सहज इच्छा (जिज्ञासा) मानव के मन में जाग उठती है और फिर वह अपनी उस कल्पना को यथार्थ में प्रकट करके (परिवर्तित करके) अपनी जिज्ञासा शांत करने के प्रयास में जुट जाता है।
आदिम युग अर्थात सृष्टि के प्रारंभ से ही मानव में यह गुण विद्यमान रहे हैं। नए ज्ञान की प्राप्ति और अज्ञान को ज्ञान में परिवर्तित करने की सहज जिज्ञासा और इसके जीते-जागते प्रमाण हमारे समक्ष आज हैं। यदि मानव में उपरोक्त गुण विद्यमान न होते तो आज हम आपस में शाब्दिक भाषा का प्रयोग न कर रहे होते तथा हम अपने आपको, अपने समाज को, अपनी सभ्यता और संस्कृति को जिस
उन्नत और परिष्कृत रूप में देख रहे हैं, उस रूप में न देख पाते। भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ थी। उससे पहले मूक फिल् बनती थीं। उनमें काम करने वाले कलाकार अशाब्दिक संप्रेषण की खूबियों के प्रणेता थे। उस समय परदे पर संप्रेषण का माध्यम केवल यही था। कोई कलाकार जितनी खूबी से और असरदार अंदाज में मुद्राओं और दूसरे शारीरिक संकेतों का प्रयोग कर सकता था, वह उतना ही अच्छा और सफल कलाकार माना जाता था। जब शाब्दिक फिल्मों का दौर आया तो अशाब्दिक फिल्मों का दौर समाप्त हो गया। किन्तु शारीरिक भाषा का प्रयोग आज भी बखूबी किया जाता है।
शाब्दिक भाषा का प्रयोग एक-दूसरे से कुछ कहने अथवा सूचना आदि देने के लिए होता है, वहीं शारीरिक भाषा का प्रयोग भावों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है, जिसे ‘बॉडी लैंग्वेज’ कहते हैं। अपने भावों को व्यक्त करने के लिए स्त्री तथा पुरुषों के मस्तिष्कों में विभिन्नता होती है। स्त्रियां अधिकतर चेहरे के भावों का आश्रय लेती हैं, जबकि पुरुष शरीर की हरकतों और इशारों के द्वारा अपने भावों को व्यक्त करते हैं।
भाव व्यक्त करने अथवा दूसरे की बातों पर चेहरे पर भाव ले आने में स्त्रियों को महारत हासिल होती है। भाव पढ़ने वाला यदि ध्यानपूर्वक देखे तो उसे आश्चर्य होगा कि इनके चेहरे पर कितनी तीव्रता से भाव आते-जाते या बदलते हैं।
आप किसी स्त्री को किसी भावनात्मक घटना के बारे में बता रहे हैं, तो आपको स्त्री का चेहरा अपने द्वारा अभिव्यक्त भावनाओं को प्रतिबिंबित करता प्रतीत होगा। ध्यान से देखने पर लगेगा मानो आपके द्वारा बताई जा रही घटना का दृश्य उसकी आंखों के आगे घटित हो रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्रियां
आपको आवाज के लहजे व शारीरिक भाषा के द्वारा कही गई बातों के अर्थ को अच्छी तरह समझती है और अपने समझे हुए भावों को अपने चेहरे के भावों तथा शारीरिक भाषा के द्वारा व्यक्त करती हैं।
पुरुषों को स्त्रियों की तुलना में थोड़ा कम भावना प्रधान माना जाता है, किन्तु ऐसे बहुत से लोग देखने में आते हैं, जिनके चेहरे के भाव तेजी से तो बदलते हैं, मगर स्त्रियों जितनी तेजी से नहीं। बहुत से व्यक्ति अपनी शारीरिक भाषा के द्वारा ही अपने भावों को व्यक्त करते हैं। कभी-कभी उनकी आंखें और चेहरे की बदली आकृति बहुत कुछ कह जाती है।
एक अध्ययनकर्ता के अनुसार एक पुरुष किसी परिचित स्त्री की भावनाओं को जब अपने चेहरे के माध्यम से प्रदर्शित करता है, तो वह स्त्री को आकर्षक ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान भी प्रतीत होता है। स्त्रियों की भांति पुरुष भी भावनाओं को अनुभव करते हैं, पर वे स्त्रियों जितनी तीव्रता के साथ उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर पाते। यह अंतर उन दोनों में साफ देखा जाता है।
बहुत से लोगों का मत यह है कि पुरुषों के मस्तिष्क शरीर की भाषा (बॉडी लैंग्वेज) को पूर्णतया पढ़ने में सक्षम नहीं होते, इसलिए स्त्रियों द्वारा अधिकांश पुरुषों को दूसरों की आवश्यकताओं या भावनाओं के प्रति लापरवाह कहा जाता है। 1 उदाहरण के लिए एक कॉकटेल पार्टी में अनेक स्त्रियों से घिरी हुई स्त्री ने अपने पति को आंखों से कई बार संकेत किया, किन्तु पति उसके संकेत को समझ ही न गाया। बाद में पार्टी से वापस आकर पत्नी ने बड़ी बेरुखी से कहा, “कैसे इंसान हो तुम, मैंने कितनी बार आंखों से तुम्हें संकेत किया कि मैं पार्टी छोड़कर घर जाना चाहती हूं।”
“सॉरी”, पति ने माफी मांगते हुए कहा, “मैं तुम्हारे संकेत को समझ नहीं पाया।”
पति अपनी पत्नी द्वारा किए गए संकेत को समझ नहीं सका, लेकिन यदि यही संकेत पत्नी ने किसी स्त्री को दिया होता, तो वह उसके संकेत को तुरंत समझ जाती। पुरुषों के लिए यह आश्चर्य की बात हो सकती है कि स्त्रियां किस प्रकार काम, क्रोध, चालाकी, असहमति और पलायन के किए जाने वाले संकेतों को स्पष्ट समझ लेती हैं, जबकि ऐसे संकेतों (भाषा) को सूक्ष्मता के साथ पढ़ना पुरुषों के लिए संभव नहीं होता। स्त्रियों में इस प्रकार की कुछ विशेषताएं जन्मजात भी होती हैं। संभव है, बहुत से पुरुष भी संकेत समझने या शारीरिक भाषा पढ़ने में स्त्रियों की समानता करते हों।
मानव जीवन के क्रियाकलापों में शरीर की भाषा का सर्वाधिक महत्व है, अतः इस भाषा को सीखना महत्वपूर्ण ही नहीं, अनिवार्य भी है। इसका सीखना कुछ ऐसा ही है, जैसे गूंगे और बहरे बच्चों को मूक भाषा का ज्ञान प्रदान करना।
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